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संवेदनहीन 'अमर बेल' और परिवर्तित 'यूजीसी' प्राविधान

'अमर बेल ' का प्राकृतिक गुण यह है कि मूलाधार वृक्ष का ही नुकसान करके विकसित होती है,शोषण करके मूलाधार वृक्ष पर आच्छादित होकर इतराती है,मतलब स्वार्थी और घोर संवेदनहीन होती है।इसी क्रम में सत्ता, व्यवस्था और राजनीति जब मतदाताओं,समर्थकों और समर्पित जनगण के शोषण पर तुल जाए उनकी उर्जा और संसाधनों पर कुठारघात करने लगे तो वह 'अमर बेल ' बन जाती है।आज महिमामंडित भारतीय जनता पार्टी 'यूजीसी' के अनापेक्षित प्रावधानों को लागू करके 'अमर बेल ' बन गयी है। परिवर्तित यूजीसी प्राविधान,सामाजिक स्वास्थ्य के लिए खतरा है चूंकि मूल संवैधानिक भावना के प्रतिकूल है।संविधान मे धर्म,जाति,वंश,लिंग और जन्म के आधार पर भेदभाव पूर्णतः वर्जित है,न्याय के समक्ष समानता के अधिकार का क्या होगा ? कानून न्याय का प्रतीक है लेकिन कानून का दुरूपयोग घोर अन्याय का प्रत्यक्ष प्रमाण भी है। पीड़ित और दोषी का निर्धारण कैसे होगा ?मिथ्या आरोप यदि सच साबित हो गए तो फिर जग जाहिर जय अपनी जगह लेकिन यदि सच साबित न हुए तो ? तो दोषी कौन ? पीड़ित कौन ? मिथ्या आरोप के बाद आरोपी को दंड मुक्त रखना क्या दोषी बने आरोप...

'कट्टरता आत्मघाती है ?'

 गलत-सही के फर्क से परे दुनिया में लोगों को स्वदेश हितार्थ उसकी वैश्विक नीतियों के साथ,उसके फैसलों के साथ समर्पित भाव से खड़े होते हुए भी आज दुनिया ही देख रही है,लेकिन हमारे स्वदेश भारत में क्या हो रहा है ? जबकि हमारा सौभाग्य यह है कि हमारा देश गलत -सही के फर्क को न केवल समझता है बल्कि सही के साथ यथासंभव खड़े होने की सामर्थ्य भी जुटाता है और गलत के प्रतिकार का साहस भी,तो फिर यहां पर आतंक और दहशत को सरमाथे लगाने वालों को बदनसीब कहिएगा या फिर देश का दुर्भाग्य ? हराम से मोहब्बत और इंसानियत से तौबा की कवायद का हश्र क्या होगा ?अंजाम-ऐ नफरत से हासिल क्या होगा ? गैरों (राष्ट्र विरोधी मंसूबों) पर रहम और अपनों पर सितम क्यों ? कारनामें सभी न तो भगवान को स्वीकार्य हैं न ही खुदा को मंजूर !असल में हमारी खुशी के लिए ही 'नियंता' (परम सत्ता) ने स्वयं को अनेकानेक नामों में बंटने दिया,लेकिन जरा सोंचिए!इंसान(हम) ही बंटकर बिखरने लगे तो ? सारगर्भित आशय यह है कि इंसानियत को बख्श दिया जाए,उस पर रत्ती भर भी खरोंच न आने की जिम्मेदारी ही सभी धर्मों का असल धर्म है।             ...