संवेदनहीन 'अमर बेल' और परिवर्तित 'यूजीसी' प्राविधान
'अमर बेल ' का प्राकृतिक गुण यह है कि मूलाधार वृक्ष का ही नुकसान करके विकसित होती है,शोषण करके मूलाधार वृक्ष पर आच्छादित होकर इतराती है,मतलब स्वार्थी और घोर संवेदनहीन होती है।इसी क्रम में सत्ता, व्यवस्था और राजनीति जब मतदाताओं,समर्थकों और समर्पित जनगण के शोषण पर तुल जाए उनकी उर्जा और संसाधनों पर कुठारघात करने लगे तो वह 'अमर बेल ' बन जाती है।आज महिमामंडित भारतीय जनता पार्टी 'यूजीसी' के अनापेक्षित प्रावधानों को लागू करके 'अमर बेल ' बन गयी है। परिवर्तित यूजीसी प्राविधान,सामाजिक स्वास्थ्य के लिए खतरा है चूंकि मूल संवैधानिक भावना के प्रतिकूल है।संविधान मे धर्म,जाति,वंश,लिंग और जन्म के आधार पर भेदभाव पूर्णतः वर्जित है,न्याय के समक्ष समानता के अधिकार का क्या होगा ? कानून न्याय का प्रतीक है लेकिन कानून का दुरूपयोग घोर अन्याय का प्रत्यक्ष प्रमाण भी है। पीड़ित और दोषी का निर्धारण कैसे होगा ?मिथ्या आरोप यदि सच साबित हो गए तो फिर जग जाहिर जय अपनी जगह लेकिन यदि सच साबित न हुए तो ? तो दोषी कौन ? पीड़ित कौन ? मिथ्या आरोप के बाद आरोपी को दंड मुक्त रखना क्या दोषी बने आरोप...