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आरक्षण!का स्वरूप

आरक्षण! आरक्षण का राजनीति प्रेरित वर्तमान स्वरूप तमाम विसंगतियों का कारक है और प्रतिभाओं का भक्षक सिद्ध हो रहा है परिणामस्वरूप तमाम योजनाओं के चलते हमारा देश अपेक्षित विकास पैमाने में कहीं नजर नही आ रहा है कम से कम योजनाओं की लागत के अनुसार तो कतई नही निश्चित रूप से यह आरक्षण रूपी महामारी राष्ट्रीय एकता,विकास और सद्भाव के लिए आत्महंता की अप्रिय इबारत लिख रही है,गैर आरक्षित श्रेणी में आक्रोश जन्मना स्वाभाविक है जोकि भावी भारत के लिए अशुभ है जरा सोचिए आरक्षण के लाभार्थी योग्यता के अभाव में भला कैसे अपनी जिम्मेवारियों का निर्वाहन कर सकते ?और प्रताड़ित योग्यता कहां अपना दम तोड़ेगी? यह बात राष्ट्रहित में आरक्षित श्रेणियों को सोचनी चाहिए मतलब व्याप्त विसंगतियों वो स्वयं को चाहकर भी अलग नही कर सकते @                                    आरक्षण ! आरक्षण! आरक्षण!  हम स्वयं से और तमाम सर्वणों से मिलकर यह जानने का प्रयास किए कि क्या कभी हमारे बाप -दादा इतने सक्षम और बाहुबली थे ?कि तथाकथित गैर सर्वणों का शोषण...

'महाराष्ट्र का महातंत्र बेचारा जनतंत्र'

महाप्रजातंत्र की बानगी बना महाराष्ट्र संभवत: अभिभूत हो रहा है प्रजातांत्रिक मूल्यों से,और मीडिया इन अविस्मरणीय पलों की साक्षी बनकर 'चित्त और पट दोनों मेरी'चरितार्थ कर रही है|सभी सरकारी संस्थान ' चोरी करवा रहें हैं,जागते रहो श्लोगन' के साथ|विधायिका का चीर हरण हो रहा है 'महाभारत' के सभी पात्र (संवैधानिक पदासीन) अपनी -अपनी भूमिका का निर्वाहन तन्मयता से कर रहे हैं| माननीय नवनिर्वाचित विधायक गण चतुरसेन जी की 'नगर वधू ' की महती भूमिका का बखूबी निर्वाहन निज धर्म सरीखे कर रहे हैं, उम्र दराज सात दशकीय जनतंत्र अपनी अस्मत को येन-केन-प्रकारणेन ढकने की कोशिशों में रत है,यह भारत है नेता यहां के रत्न हैं,सत्ता ही स्वर्ग है, तथाकथित सेवा की सीढ़ी से स्वर्ग प्राप्ति ही राजनैतिक धर्म अघोषित प्रस्तावना है|                 जय हो 🙏 जय हो 🙏                    नरेन्द्र नाथ त्रिपाठी

"आरक्षण का आकर्षण"

देश भारत में लगभग 70% जनसंख्या  आरक्षण की लाभार्थी है।तो यक्ष प्रश्न यह है कि आखिरकार 70 वर्षों के इस आरक्षण वाले विकास को लकवा क्यों मार गया।आसमान खा गया या धरती निगल गयी आरक्षण वाले विकास को।मत भूलें गरीब,गरीब होता है शोषित-पीड़ित,शोषित-पीड़ित होता है इनकी कोई जाति नही होती।वास्तव में आज जाति दो ही शेष हैं एक अमीर एक गरीब।गौरतलब हो विकास का रथ जातिगत आरक्षण की आपाधापी से तो हांका ही नही जा सकता,विगत सात दशक ज्वलंत उदाहरण हैं पुष्टि भी|परिस्थितियां कल्याणकारी वातावरण के लिए क्रान्तिकारी परिवर्तन चाहती हैं, श्रीगणेश भी जनसामान्य को ही करना है 🙏