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पंचायत चुनाव की प्रासंगिकता और जनपद #रायबरेली विशेषांक

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खरी-खरी !                 पंचायत  स्तरीय स्थानीय निकाय चुनाव के सभी प्रत्याशियों को उनके उद्देश्य(तथाकथित सेवक)बनने की शुभकामनाएं।चूंकि आप सभी एक व्यक्ति मात्र नही बल्कि सामूहिक नेतृत्व में संविधान सम्मत 'गांव सरकार' की आधारशिला हैं।लेकिन खेद इस बात का है कि अभी तक गांव सरकार की संकल्पना चरितार्थ ही नही हो पाई, चूंकि 'ब्लाक प्रमुख' और 'जिला पंचायत अध्यक्ष' निवेश की विषय वस्तु हैं अभी तक मतलब ये दोनों पद खरीददारी का खुला बाजार हैं।और इस सच को सरकारें ही नहीं बल्कि जनता-जनार्दन भी भली भांति जानती है। महिमामंडित तथाकथित समाजसेवी, वर्चस्वी नामी-ग्रामी,प्रभुता संपन्न लोग संविधान सम्मत चुनावी आरक्षण व्यवस्था पर भारी पड़ते हैं जब प्रत्यासी प्यादे होते हैं शतरंज के मोहरे होते हैं।मजे की बात तो यह है कि यहां आरक्षण के पात्रों /समर्थकों के "मुंह में दही जम जाता है" उनका हलक 'हलाहल' हो जाता है,घिघ्घी बंध जाती है,बंधक व्यवस्था के सूत्रपात सिद्ध हो जाते हैं। खैर जो है सो है के भाव में राजनैतिक चर्चा में महिमामंडित और केन्द्र में भी केन्द्रित जनपद #रायबरेल...

बंधक बनी दिल्ली !सरकार बनाम तथाकथित किसान।

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किसान भगवान है , दरिद्र नारायण की तरह जबकि किसान न तो भगवान है और न ही दरिद्र कोई नारायण है लोक व्यवहार की दुनियावी किताब में।किसान को अन्नदाता की औपचारिक मानक उपाधि मजाक महज है।सच में दाता तो माननीय सरकारें और उनका तंत्र होता है,प्रजातांत्रिक अवधारणा यह कि "जनता का जनता के लिए जनता द्वारा शासन जबकि दुर्भाग्यवश व्यवहार में कुछ लोगों का कुछ लोगों के लिए कुछ लोगों द्वारा शासन चरितार्थ होता है।जातियों का अत्याधुनिक वर्गीकरण अमीर- गरीब,शोषक और शोषित पर केन्द्रित हो रहा है।लेकिन इन विरोधाभासों के लिए शोषक से अधिक शोषित जिम्मेदार है मतलब "आ बैल मुझे मार चरितार्थ है"।प्रतिनिधित्व एक ऐसा आभासी सच है जो झूठ बनकर महिमामंडित होता है सम्मानित भी,स्थानीय प्रतिनिधित्व की महिमा अवर्णनीय है।                    असल में असल किसान आशा की फसल और नोन-तेल-लकड़ी से नहीं लड़ पा रहा है तो सरकार से क्या खाक लड़ेगा? तो फिर यक्ष प्रश्न यह है कि आखिर लड़ कौन रहा है?और लड़ क्यों रहा है?झूठ वाला सच तो यह भी है कि बहुतेरे धन्नासेठ/नौकरशाह और नेता आयकर से आं...

'बचेंगी बेटियां तब तो पढ़ेंगी बेटियां!'

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हे भगवान! उठा ले ऐसी कानून व्यवस्था शासन-प्रशासन /सरकार सरीखी  छत्र छाया ।  सामान्यतः          अधिकांश प्राणियों को अपनी संतान से अतिशय प्रेम होता,प्राणि श्रेष्ठ मानव को अधिकाधिक होता है,अपने प्राणों से भी प्रिय होती हैं संताने।लेकिन विडंबना कभी-कभी ऐसी होती है कि वही मात-पिता जब वृद्ध होते हैं और संताने जब बड़ी हो जाती हैं,दुर्भाग्यवश वही संतान जब कर्तव्य बोध से विमुख हो जाती हैं,यातनाओं की कारक बन जाती हैं,नराधम बन जाती है ,अपराध का पर्याय बन जाती है तो वही वृद्ध माता -पिता अपनी छत्र छाया संतान के लिए दुआ नही बद्दुआ मांगने लगते हैं,उनका अभागापन चीख -चीख कर कहता है कि ' हे भगवान इससे अच्छा तो हम निःसंतान होते'। लेकिन इससे भी उनका दारूण दुःख कम नही होता,और अनसुना करूण क्रंदन खुद के मरने की मन्नत करने लगता है।               चूंकि सरकारें और उनकी राज -काज संचालक प्रशासनिक व्यवस्थाएं  जन-गण के लिए छत्र  -छाया सरीखी होती हैं।अंतिम छोर के निरीह से निरीह शोषित-पीड़ित,वंचित के लिए न्याय स्वरूप सुरक्षा कवच  ...

'आयकर पर प्रधानमंत्री जी की अभिनंदनीय चिंता'

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' आयकर ' पर गहरी चिंता प्रधानमंत्री जी की अभिनंदनीय है,लेकिन आयकर के बड़े चोरों पर डंडा भी जन-गण-मन मनोरथ है।मेरे सरकार! न खांऊगा तो ठीक है,चरितार्थ भी है लेकिन ' खाने नहीं दूंगा' अपुष्ट है,चरितार्थ भी नही है।गौरतलब है कि "न खांऊगा न खाने दूंगा" यह ध्येय श्लोगन था आगाज था बतौर सरकार माननीय प्रधानमंत्री जी का। नौकरशाह,उद्योगपति,और माननीय तमाम न केवल खा रहें हैं बल्कि बांध के भी ले जा रहें,खाने का आलम यह है कि न बदहजमी का ख्याल है न रोग की चिंता है और न ही दूसरे किसी के निवाले की।व्यवसायों के पंजीकरण और पैन पर निगरानी जरूरी है।किसान बने उद्यमियों/नौकरशाहों और अकूत संपित्त के माननीयों पर मय वसूली दंडात्मक कार्यवाही आग्रह की विषय वस्तु है।जमीन से जुड़े नेतृत्व की परिभाषा और मायने बदल गए हैं,मतलब ग्रामीणांचल से लेकर अर्बन और महानगरीय जमीनों बेशुमार लगाव शोध का विषय है,कुछ नराधमों का दो चार बीघे से जमीनी जुड़ाव है तो बहुतों का दस-बीस-पचास बीघे से। अदायगी के संबंध में माननीय प्रधानमंत्री जी के आग्रह को क्रियात्मक रूप में स्वीकार करना जन-गण की नैतिक जिम्...

भूमिपूजन/शिलान्यास की दो अति विशेष बातें,पाठकों का संवाद निनिवेदित है।

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##जयसियाराम यज्ञ विधान और निहित कल्याण की व्यापकता,सार्वभौमिकता यजमान के मनोरथ पर निर्भर करती है।पौराणिक कथाएं और  ऐतिहासिक अध्ययन यज्ञ की महत्ता और सार्थकता की पुष्टि करते हैं,कल्याणकारी अभीष्ट की प्राप्ति यज्ञ रूप देवपुरूष और दक्षिणा रूपी देवनारी से संभव है,यहां दान का उल्लेख प्रासंगिक है यह समझने के लिए कि दान कभी दक्षिणा नही हो सकती क्योंकि दक्षिणा ऐच्छिक नहीं होती बल्कि जरूरी होती है व्यास पदासीन पुरोहित का धर्म सम्मत अधिकार है दक्षिणा।अनुष्ठान संकल्प से सिद्ध होता है और संकल्प अनुष्ठान से,ईष्टदेव और स्वयं को साक्षी मानकर प्रथम पूज्य गौरी गणेश के सम्मुख पुरोहित द्वारा संकल्प कराया जाता है।                         बतौर यजमान श्रीमान नरेन्द्र दामोदर दास मोदी ने जो भी संकल्प लिया हो,संभवतः लोक कल्याण ही होगा,चूंकि प्रस्थिति संकल्प का दायरा निश्चित करती है,जाहिर सी बात है जितनी बड़ी प्रस्थिति होगी संकल्प भी उतना बड़ा होगा या संकल्प जितना बड़ा होगा प्रस्थिति उतनी बड़ी होगी ।रामलला विराजमान न्यास मन्दिर के भूमि ...

'कुत्ता'

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कुत्ता एक वफादार चौपाया प्राणी है,तन्मयता वाली स्वामि भक्ति जग-जाहिर है सदा से। प्राणि श्रेष्ठ मानव भी मानता है कि वफादारी में कुत्ते का सानी नहीं है ।यह प्रिय प्राणी भेड़िए कुल की प्रजाति है कुछ विशेष मनुष्यों की ही तरह यह भी सर्वाहारी होता है। संवेदनशीलता और सूंघने की अद्भुत शक्ति इसका अलग मुकाम तय करती है, अत्याधुनिक समाज में  विशेष किस्म के कुत्तों के प्रति दीवानगी, लाड़-प्यार और दुलार ने उसके रूतबे को न‌ई ऊंचाई दी है। बचपन से ही तुलनात्मक अध्ययन में 'श्वान निद्रा' सिखाई जाती है,विश्वस्तरीय दस नस्लों में लैब्राडोर,जर्मन शेफर्ड,बुलडाग,माल्टीज,बीगल्स,गोल्डन रिट्रीवर,जैक रसेल टेरियर,पग,न्यूफाउंडलैंड,पूडल प्रमुख हैं,मूल गुणों के अतिरिक्त अलग-अलग नस्लों की अलग-अलग उपयोगिताएं हैं।इन तमाम अच्छाइयों और उपयोगिताओं के अतिरिक्त दृष्टांत सरीखे उपमान भी अध्ययन की विषयवस्तु हैं ,मसलन बद्दुआ और गाली में कुत्तों का जिक्र आखिर क्यों होता है?ऐसा क्या है इस लोकप्रिय प्राणी में, किसी को कुत्ता कहना बहुत बड़ी गाली है,या किसी को कुत्ता कहकर उसकी बेइज्जती से संतुष्ट हुआ जाता है।इस प...

यह कैसी 'ममता' है?पं बंगाल विशेषांक!

पश्चिम बंगाल का सियासी जादू बेकरार सरकार पर सर चढ़ कर बोल रहा है, राजनैतिक अखाड़े में आरोप-प्रत्यारोप वाले दांव-पेंचों के बीच निरन्तर गिरता राजनैतिक स्तर और संक्रंमण का बढ़ता खतरा राष्ट्रीय चिंतन का विषय है,किसी राज्य के निवासियों की सभी तरह से सुरक्षा उस राज्य की सरकार का बाध्यकारी संवैधानिक उत्तर दायित्व है,संकटकाल में इस उत्तर दायित्व के साथ मुख्यमंत्री की नैतिक जिम्मेवारी भी सुनिश्चित हो जाती है,चूंकि संवेदनहीन,राष्ट्रीय भावना रहित,जनहित की नजरंदाजी वाली निरंकुश व्यवस्था, अधिनायक तंत्र और तानाशाही की परिचायक है,महामारी कोरोना को लेकर मुख्यमंत्री पं बंगाल ममता बनर्जी का  समसामयिक तानाशाही रवै‌इय्या भारत के संघीय ढांचे,और उसकी संवैधानिक व्यवस्था पर कुठाराघात है। महामारी से लड़ रहे भारत के पराक्रम और प्रयासों से दुनिया न केवल चकित हैं बल्कि नतमस्तक होकर धन्यवाद भी ज्ञापित कर रही है। लेकिन मुख्यमंत्री ममता न केवल इस गौरवान्वित खबर से बेखबर हैं बल्कि खुद की जिम्मेवारियों से भी । लड़ाई के शुरूआती दिनों में ऐसा लगा कि राजनीति की दीदी,राजनैतिक मत-भेद को ताख पर रखकर केवल और केवल कोरोना ...