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#करोना बनाम #चाइनीज वायरस और संकल्पित भारत

यह करोना बनाम चाइनीज वायरस जैविक अघोषित युद्ध है चीन द्वारा इस बात का मानना उतना जरूरी नही जितना समझना।यह महामारी का दौर युद्धकाल है,इस लडाई में चिकित्सा से जरूरी सुरक्षा है।और इस सुरक्षा में प्रत्येक देशवासी स्वयं सिपाही है योद्धा है।दुश्मन हमारा अमूर्त और मजबूत है,देश-दुनिया मे मची तबाही इसका सबूत है।निश्चित रूप से जान-माल को नुकसान के मंसूबे में उसने जान जोखिम में डालकर औसत दर्जे के माल का विश्वव्यापी नुकसान कर दिया है स्वयं के लाभ की रणनीति के साथ।हालाकि उपमा विहीन रचा भारत को विधाता ने भारत के सम केवल भारत है,हम हारने वाले नहीं बल्कि हौंसले को हथियार बनाकर इतिहास रचने वाले हैं,लेकिन इस समय जरा सी लापरवाही की कीमत बहुत भारी होगी।मतलब हमें हमारे सुरक्षा कवच को किसी कीमत पर टूटने नहीं  देना है हमें #lockdown को डाउन नहीं होने देना है।                लेकिन गैर जरूरी आवागमन और विचरण न रुका तो हम भले ही न हारें लेकिन दुश्मन जीत सकता है।इसलिए जनहित में राष्ट्र हित में जारी दिशा-निर्देशों के प्रति संकल्पों को हमें युद्ध जीतने तक प्रतिपल याद रखना...

कनिका बनाम विष कन्या

राज तंत्र का इतिहास और वैदिक साहित्य विष कन्याओं से आच्छादित है,षणयंत्र की पोषक सामग्री से परवरिश हुआ करती थी बला की खूबसूरत कन्याओं को बचपन से ही तैयार किया जाता था शत्रुओं का छलपूर्वक जान-माल हानि के लिए,विष की अल्प मात्रा और विषैली वनस्पति एवं विषैले जीव-जंतुओं से अभ्यस्त किया जाता था।विशेष रुप से संगीत एवं नृत्य की आकर्षक कलाओं में पारंगत होती थी यह जहर से बुझी मदमस्त यौवन की मल्लिकाएं,विष कन्याएं।छल विद्या का प्रशिक्षण पूर्ण करने के बाद इनको देश-काल-परिस्थिति के अनुसार भेज दिया जाता था शत्रु मंडली में भोग-विलास की खलबली में।                 समय के साथ इनका कलेवर जरूर बदला है लेकिन कला नहीं, वर्तमान समय में तकनीक के दौर में शिकार स्वयं को इनके आस-पास रहकर स्वयं को धन्य समझता है और रसूख को सार्थक। राजनीति में इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं भी वर्णनीय हैं और यह हर युग में हर समय में रहती हैं,आज भी हैं। गुप्त सूचनाएं प्राप्त करने के लिए मंसूबे को अंजाम देने के लिए  सरकारी मशीनरी,कार्यपालिका और न्यायपालिका भी इनकी जद में हो सकती है।    ...

राष्ट्रीय दल के राष्ट्रीय जीवन पर प्रश्न ?

गांव -मोहल्ले-कस्बे,कालोनी मतलब समाज में यत्र-तत्र औपचारिक-अनौपचारिक रिश्ते -नातों का ताना-बाना और आतिथ्य भाव ही हमारी पहचान है। चूंकि मतैक्यता और मतभेदता मानवीय जीवन के ही घटक है अस्तु सामाजिकता इन्हें सहर्ष स्वीकार करती है,और सरोकारित जीवन में मतभेदता सदैव सम्मानीय विषय -वस्तु है,वास्तव में यही समाज और राष्ट्र निर्माण की कुल जमा पूंजी है।            राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में मतभेद अमूल्य निधि सरीखी है और जनतंत्र की पोषक भी,सामाजिक जीवन से बड़ा राष्ट्रीय जीवन है,इस नाते से राजनैतिक सभी दल राष्ट्रीय चरित्र की बानगी हैं और सरोकारित सक्रिय क्रिया-कलाप सार्वजनिक स्वमेव हो जाते हैं।           सोचनीय यह है कि अंतर्राष्ट्रीय आतिथ्य में आयोजित भोज में राष्ट्रीय दल कांग्रेस ने आमंत्रण का तिरस्कार क्यों किया? क्या कांग्रेस एक राजनैतिक दल के रूप में स्वयं को सार्वजनिक न मानकर व्यक्तिगत मानती है? क्या कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व यह नहीं समझता कि अंतर्राष्ट्रीय फलक पर इस अनापेक्षित तिरस्कार का संदेश कितना दूरगामी है,यद्यपि  नहीं समझता तो क्य...

#गरीबी #आरक्षण और #शिक्षा

चूंकि आरक्षण की व्यवस्था का आधारभूत कारक सभी भारतीयों में समानता लाने की कोशिश ही रही होगी!जोकि पूर्ण असफल रही अब तक।इसकी जग-जाहिर असफलता पर भारतीय नेतागिरी बनाम मठाधीशी को गर्व भी है,क्यों न हो?आखिरकार ७० वर्षों की कड़ी मेहनत जो ठहरी।सही बात तो यह है कि भारतीय सियासत ने शब्द #गरीबी का पेटेंट करवा लिया है विश्व स्तर पर स्वयं के लिए।संवेदनशील सियासी हथियार बना लिया है जबकि मजे की बात यह भी है कि अब तक #गरीबी की परिभाषा भी ढंग से गढ़ी नही जा सकी। माना जाता है कि शिक्षा ऐसा तूफान है जो अपने साथ तमाम बुराइयों को बहा ले जाता है, कुरीतियों और आडंबरों पर बल भर प्रहार करती है शिक्षा जबकि एक दृष्टांत देखिए व्यहार में जो जितना पढ़ा-लिखा जितना शिक्षित हैं वह उतना अधिक मंहगा है वर हेतु मतलब बड़ा दहेजू बकरा,इतना ही नहीं संस्कारों की बहुत उम्मीद नहीं की जा सकती तथाकथित अधिक पढ़ी-लिखी बिरादरी से,गरीबी से गरीबों के लिए नहीं लड़ती यह बहुत बड़ी पढ़ी -लिखी संपन्न बिरादरी वरन स्वयं को अर्थ युग में प्रतिस्थापित करने‌ के लिए लड़ती है येन-केन-प्रकारेण के स्तर पर,दूसरा पहलू भी देखिए जिस शिक्षा को बुराई से लड़न...

"फैसला आन दि स्पाट" की खुशी में कहीं गम का अश्क हलाल हुआ तो नहीं

न्याय प्रणाली में व्याप्त न्यायिक प्रक्रिया की अति शिथिलता मय विधि हथकंडे आज त्वरित प्रभावी सुधार के लिए याचक है माननीय ईश्वर तुल्य न्याय के समक्ष, भारतीय दंड संहिता अनेकानेक बार स्वयं को ठगा समझने लगती होगी अपराधिक महातंत्र के सम्मुख| ऐसा नहीं है कि ऐसे सुधार के मांग की कमी है लेकिन पूर्ति नहीं हो पा रही है यह अपरिभाषित सच है,मांग और पूर्ति का अनुपात राज दर्पण की अप्रिय तस्वीर का दर्शन करवाता है जो तमाम विसंगतियों को गले लगाता है, हमारा संविधान संवेदनाओं से ओत-प्रोत है|विशुद्ध जन भावनाओं का यथायोग्य ध्यान और प्रभावी संज्ञान राज-काज की रीढ़ है,इन जरूरत मय भावनाओं की अधिक उपेक्षा में जनाक्रोश का मूलाधार निहित होता है|नीति नियंताओं से अपेक्षा यह होती है कि वे जन भावनाओं की कद्र तब जरूर करें जब वो देश व्यापी जनाक्रोश में रूपांतरित हो रही हों|               हैदराबाद के वीभत्स दुष्कर्म कांड के बाद जन भावनाओं का जनाक्रोश रुप देश -दुनिया देख रही है,यही जन भावनाएं सवाल दाग रही हैं कि 'नि‌र्भया' के गुनहगारों का क्या हुआ अब तक? सात वर्ष बीत गए क्या उम्र बीतने का...

गांधी अपमान बनाम दंड विधान

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥पूज्य गांधी जी की आत्मा वैचारिक रुप से विचरण कर रही है देश-दुनिया में जीवन दर्शन रुप में विद्यमान है आपका विराट व्यक्तित्व,विराटता का अनुभव संकीर्णता से संभव नहीं है,त्याग-तपस्या,साधना,श्रेष्ठ चिंतन,प्राणि मात्र के पैरोकार,प्रकृति प्रेमी, हठधर्मिता और सादगी का नाम है 'मोहन दास करमचंद गांधी'|गांधी से प्रेम करने के लिए जितना जरुरी है गांधी को जानना उससे भी अधिक जरुरी है नफरत की वजह खोजना|गांधी एक व्यक्ति नहीं वरन प्रणम्य अनुकरणीय व्यक्तित्व हैं,ऐसे व्यक्तित्व का अपमान करने की नादानी सूरज पर थूकने जैसी ओछी हरकत मात्र है,आप किसी के कुछ विचारों से असहमत हो सकते हैं कुछ प्रयोगों से असंतुष्ट हो सकते हैं लेकिन उसकी विराटता को सिरे से खारिज नहीं कर सकते|उसके अतुलनीय योगदान को कल्याणकारी सुकृत्यों को भूलाना तो बहुत दूर नजरांदाज भी नहीं कर सकते|हत्यारे गोडसे की महिमामंडना करना आपत्तिजनक ही नहीं अपराध भी है,कम से कम संवैधानिक पदासीन यह अपराध तो कतई स्वीकार्य नहीं होना चाहिए बल्कि ऐसी कलुषित अभिव्यक्ति आजादी ज...

"जनादेश वाली माननीय जनता"

"हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की और एकता अखंडता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प हो कर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई० "मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हज़ार छह विक्रमी) को एतद संविधान को अंगीकृत, अधिनियिमत और आत्मार्पित करते हैं."।                     उक्त उल्लेखित उद्देश्य या प्रस्तावना केवल शब्द मात्र नहीं हैं बल्कि भारतीय संविधान का सारगर्भित प्राण प्रतिष्ठित अप्रतिम,अतुलनीय वह शब्द स्वरुप है जो भारत के निवासियों को भारतीय बनाता है,अपने संविधान को जानना और मानना परम धर्म है,"जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती॥"जैसा कि प्रस्तावना का श्री गणेश ही 'हम भारत के लोग' से  आहुत किया गय...