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।।मत भूलो जनाब यह भारत की मिट्टी है,तुम्हारी नापाक औकात बहुत सस्ती है ।।

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खेल , नियमों  द्वारा संचालित होने वाली एक प्रतियोगी श्रंखला  है। ... सामान्यतः खेल को एक संगठित, प्रतिस्पर्धात्मक और प्रशिक्षित शारीरिक/मानसिक गतिविधि के रूप में परिभाषित किया जा सकता है,खेल हमें प्रतिबद्धता तथा निष्पक्षता सिखाता है,जीवन में अधिक अनुशासित, धैर्यवान, समयनिष्ठ और विनम्र बनाता है। यह हमें सभी कमजोरियों को दूर करके जीवन में आगे बढ़ना सिखाता है,खेल हमें निर्भीक और आत्म विश्वासी बनाता है,नेतृत्व क्षमता पुष्ट करता है,समग्र व्यक्तित्व का समुचित विकास करता है,खिलाड़ियों के अतिरिक्त दर्शक और रूचिकर लोगों को भी लाभान्वित करता है खेल। जीत और हार इसके सोपान हैं,अच्छा खेल प्रतिद्वन्द्वी का भी दिल  जीतता है।अस्तु खेल का नैसर्गिक आनन्द अवसाद और निन्दा की अनुमति नहीं देता बल्कि जीत और हार सम्यक ग्राह्य की विषय वस्तु है।          देश-दुनिया में क्रिकेट खेल के प्रति दीवानगी और लोकप्रियता अपने चरमोत्कर्ष पर है।लेकिन खेल के वास्तविक आनन्द से परे अब इस दीवानगी की विद्रूपता भी यत्र-तत्र परिलक्षित हो रही है,मसलन सट्टेबाजी से लेकर कलुषित आति...

'कट्टरता' घातक है!अस्तु त्याज्य है।

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'कट्टरता' की प्रासंगिकता अध्ययन और शोध का विषय होना चाहिए,कट्टरता क्या दे सकती है और बदले में क्या ले सकती है?धार्मिक कट्टरता उन्माद,विद्वेष,नफरत और अति के चरमोत्कर्ष पर हिंसा का पोषण भी करती है,कबीलाई संस्कृति का समर्थन करती है।अपने धर्म अपनी जाति और स्वदेश से अनुराग होना चाहिए गर्व होना,निज मान -मर्यादा का ध्यान होना चाहिए,प्राणि श्रेष्ठ मनुष्य जहां से भी स्वयं को जोड़े वह भी गौरवान्वित होना चाहिए ऐसे सम्यक कर्म होने चाहिए। सदैव सनद रहे कि 'सत्य के साथ किसी भी तरह का अनापेक्षित व्यवहार भी उसकी महत्ता और प्रभाव को रंच मात्र भी प्रभावित नहीं कर सकता है' सत्य का अक्षय होना ही सत्य की प्रमाणिकता और सर्व व्यापी प्रभाव की पुष्टि करता है'।सत्य ही साश्वत है,सत्य में लीपापोती का प्रयास सदा विफल ही रहा है और सदा विफल ही होना ईश्वरीय विधान में सुनिश्चित है।इतिहास साक्षी है हमारी ही भारतीय सभ्यता और संस्कृति के साथ कितना छल -प्रपंच किया गया नराधमों द्वारा कुचलने की कलुषित कोशिश का परिणाम भी जग जाहिर है।मानव धर्म सर्वोपरि है बाद इसके किसी धर्म का अभिप्राय समझने और ...

मनभावन पावन 'राखी'

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रिश्ते-नाते हमारे जन्म से पहले  जीवन के बाद  और जीवन के साथ -साथ अपरिहार्य रूप से विद्यमान रहते हैं ।चूंकि समाज संबधों की एक व्यवस्था है कहने का आशय यह है कि जहां संबध हैं वहां समाज है,संबधों का वर्गीकरण किया जा सकता है लेकिन मूलतः रक्त संबंध और गैर रक्त व्यवहारिक संबध प्रमुख वर्गीकरण है रक्त संबंध को प्रदत्त और गैर रक्त को अर्जित संबंधों के रूप में समझा जा सकता है।    सामाजिक त्यौहारों की एक वृहद श्रंखला है और सभी का सामाजिक बहुतार्किक सरोकार है।इसी कड़ी में है हमारा त्यौहार 'राखी'/रक्षाबंधन,यह त्यौहार भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का प्रतीक है,बहनें भाइयों की कलाई में अपना प्यार बांधती हैं अपनी अपेक्षाएं कच्चे धागे के जरिए कहती हैं अपनी अस्मिता की रक्षा का भार सौंपती है और भाई ताउम्र उक्त जज्बातों का ख्याल एवं पावन रिश्ते की गरिमा के लिए संकल्पित होते हैं,मजे की बात तो यह है कि यह सब संवाद मन ही मन में होता सदा सामर्थ्य समर्थ शब्दों की प्रासंगिकता गौड़ हो जाती है, देश में आवागमन का मय अति उत्साहित उत्सवित माहौल छा जाता है,भाइयों को बहनों का और बहनों को भाईय...

पंचायत चुनाव की प्रासंगिकता और जनपद #रायबरेली विशेषांक

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खरी-खरी !                 पंचायत  स्तरीय स्थानीय निकाय चुनाव के सभी प्रत्याशियों को उनके उद्देश्य(तथाकथित सेवक)बनने की शुभकामनाएं।चूंकि आप सभी एक व्यक्ति मात्र नही बल्कि सामूहिक नेतृत्व में संविधान सम्मत 'गांव सरकार' की आधारशिला हैं।लेकिन खेद इस बात का है कि अभी तक गांव सरकार की संकल्पना चरितार्थ ही नही हो पाई, चूंकि 'ब्लाक प्रमुख' और 'जिला पंचायत अध्यक्ष' निवेश की विषय वस्तु हैं अभी तक मतलब ये दोनों पद खरीददारी का खुला बाजार हैं।और इस सच को सरकारें ही नहीं बल्कि जनता-जनार्दन भी भली भांति जानती है। महिमामंडित तथाकथित समाजसेवी, वर्चस्वी नामी-ग्रामी,प्रभुता संपन्न लोग संविधान सम्मत चुनावी आरक्षण व्यवस्था पर भारी पड़ते हैं जब प्रत्यासी प्यादे होते हैं शतरंज के मोहरे होते हैं।मजे की बात तो यह है कि यहां आरक्षण के पात्रों /समर्थकों के "मुंह में दही जम जाता है" उनका हलक 'हलाहल' हो जाता है,घिघ्घी बंध जाती है,बंधक व्यवस्था के सूत्रपात सिद्ध हो जाते हैं। खैर जो है सो है के भाव में राजनैतिक चर्चा में महिमामंडित और केन्द्र में भी केन्द्रित जनपद #रायबरेल...

बंधक बनी दिल्ली !सरकार बनाम तथाकथित किसान।

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किसान भगवान है , दरिद्र नारायण की तरह जबकि किसान न तो भगवान है और न ही दरिद्र कोई नारायण है लोक व्यवहार की दुनियावी किताब में।किसान को अन्नदाता की औपचारिक मानक उपाधि मजाक महज है।सच में दाता तो माननीय सरकारें और उनका तंत्र होता है,प्रजातांत्रिक अवधारणा यह कि "जनता का जनता के लिए जनता द्वारा शासन जबकि दुर्भाग्यवश व्यवहार में कुछ लोगों का कुछ लोगों के लिए कुछ लोगों द्वारा शासन चरितार्थ होता है।जातियों का अत्याधुनिक वर्गीकरण अमीर- गरीब,शोषक और शोषित पर केन्द्रित हो रहा है।लेकिन इन विरोधाभासों के लिए शोषक से अधिक शोषित जिम्मेदार है मतलब "आ बैल मुझे मार चरितार्थ है"।प्रतिनिधित्व एक ऐसा आभासी सच है जो झूठ बनकर महिमामंडित होता है सम्मानित भी,स्थानीय प्रतिनिधित्व की महिमा अवर्णनीय है।                    असल में असल किसान आशा की फसल और नोन-तेल-लकड़ी से नहीं लड़ पा रहा है तो सरकार से क्या खाक लड़ेगा? तो फिर यक्ष प्रश्न यह है कि आखिर लड़ कौन रहा है?और लड़ क्यों रहा है?झूठ वाला सच तो यह भी है कि बहुतेरे धन्नासेठ/नौकरशाह और नेता आयकर से आं...

'बचेंगी बेटियां तब तो पढ़ेंगी बेटियां!'

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हे भगवान! उठा ले ऐसी कानून व्यवस्था शासन-प्रशासन /सरकार सरीखी  छत्र छाया ।  सामान्यतः          अधिकांश प्राणियों को अपनी संतान से अतिशय प्रेम होता,प्राणि श्रेष्ठ मानव को अधिकाधिक होता है,अपने प्राणों से भी प्रिय होती हैं संताने।लेकिन विडंबना कभी-कभी ऐसी होती है कि वही मात-पिता जब वृद्ध होते हैं और संताने जब बड़ी हो जाती हैं,दुर्भाग्यवश वही संतान जब कर्तव्य बोध से विमुख हो जाती हैं,यातनाओं की कारक बन जाती हैं,नराधम बन जाती है ,अपराध का पर्याय बन जाती है तो वही वृद्ध माता -पिता अपनी छत्र छाया संतान के लिए दुआ नही बद्दुआ मांगने लगते हैं,उनका अभागापन चीख -चीख कर कहता है कि ' हे भगवान इससे अच्छा तो हम निःसंतान होते'। लेकिन इससे भी उनका दारूण दुःख कम नही होता,और अनसुना करूण क्रंदन खुद के मरने की मन्नत करने लगता है।               चूंकि सरकारें और उनकी राज -काज संचालक प्रशासनिक व्यवस्थाएं  जन-गण के लिए छत्र  -छाया सरीखी होती हैं।अंतिम छोर के निरीह से निरीह शोषित-पीड़ित,वंचित के लिए न्याय स्वरूप सुरक्षा कवच  ...

'आयकर पर प्रधानमंत्री जी की अभिनंदनीय चिंता'

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' आयकर ' पर गहरी चिंता प्रधानमंत्री जी की अभिनंदनीय है,लेकिन आयकर के बड़े चोरों पर डंडा भी जन-गण-मन मनोरथ है।मेरे सरकार! न खांऊगा तो ठीक है,चरितार्थ भी है लेकिन ' खाने नहीं दूंगा' अपुष्ट है,चरितार्थ भी नही है।गौरतलब है कि "न खांऊगा न खाने दूंगा" यह ध्येय श्लोगन था आगाज था बतौर सरकार माननीय प्रधानमंत्री जी का। नौकरशाह,उद्योगपति,और माननीय तमाम न केवल खा रहें हैं बल्कि बांध के भी ले जा रहें,खाने का आलम यह है कि न बदहजमी का ख्याल है न रोग की चिंता है और न ही दूसरे किसी के निवाले की।व्यवसायों के पंजीकरण और पैन पर निगरानी जरूरी है।किसान बने उद्यमियों/नौकरशाहों और अकूत संपित्त के माननीयों पर मय वसूली दंडात्मक कार्यवाही आग्रह की विषय वस्तु है।जमीन से जुड़े नेतृत्व की परिभाषा और मायने बदल गए हैं,मतलब ग्रामीणांचल से लेकर अर्बन और महानगरीय जमीनों बेशुमार लगाव शोध का विषय है,कुछ नराधमों का दो चार बीघे से जमीनी जुड़ाव है तो बहुतों का दस-बीस-पचास बीघे से। अदायगी के संबंध में माननीय प्रधानमंत्री जी के आग्रह को क्रियात्मक रूप में स्वीकार करना जन-गण की नैतिक जिम्...